रविवार, 30 नवंबर 2014

आओ नेता-नेता खेलें

आओ नेता-नेता खेलें 

राजधानी के प्राइम पैलेस में एक पार्टी के बाहर भारी गहमा-गहमी थी। हमने वहाँ बाहर लान में टहल रहे एक नेतानुमा कार्यकर्ता से पूछा- क्यों भाई, आज यहाँ इतनी भीड़-भाड़ क्यों है जबकि छ्ह महीने पहले तो यहाँ कोई चिड़ी का बच्चा भी नजर नहीं आता था। कायकर्ता का जवाब था- हम अपने दिवंगत नेता की शताब्दी समारोह मनाने जा रहे हैं।

यह तो बहुत बढ़िया बात है, हमें ऐसे अवसरों पर महापुरुषों के जीवन आदर्शों से प्रेरणा मिलती है-हमने अपनी राय व्यक्त की।कार्यकर्ता ने उखड़ते हुए कहाकि सारे नेता प्रेरणादायक नहीं होते। हमारे नेता ही प्रेरणादायक हैं, दूसरी पार्टी वाले नेता तो यूं ही तथाकथित नेता हैं।

यह सुनकर हमें थोड़ा गुस्सा आ गया लेकिन उसे पी गए। महापुरुष तो महापुरुष ही होते हैं, इसमें पार्टी का क्या लेना-देना ! वह बोला- नहीं, आप फर्क समझो। हम पटेल, सुभाष,सावरकर,विवेकानंद,दीनदयाल उपाध्याय आदि को मानते हैं। नेहरू-इन्दिरा को हम नहीं मानते। गांधीजी ठीक हैं । उनका सफाई का संदेश घर-घर पहुंचा रहे हैं ना। हमने कहाकि उनका मूल संदेश तो अहिंसा का है, उसका क्या? वह उखड़ते हुए कहने लगा-अभी हटो यहाँ से,बाद में बात करेंगे। यह कहते हुए वह भीतर चला गया । हम अपनी राह पकड़ी।

कुछ आगे बढ़े तो एक और पार्टी के सामने पहले जैसी ही भीड़ देख हमारे पाँव ठिठक गए। हमने वहाँ एक खद्दरधारी से पूछा- यहाँ क्या चल रहा है जी? वह कहने लगा-हम अपने महान नेता की शताब्दी मनाने जा रहे हैं। हमारी पार्टी ने देश को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, नेहरू, सुभाष, अबुल कलाम, शास्त्री, पटेल, इन्दिरा, राजीव, जैसे महान नेता दिये, दूसरी पार्टियों के पास कुछ भी नहीं। हमने कहा- सारे नेता देश के महापुरुष हैं। आप इन्हे क्यों पार्टियों के खांचों-साँचों में में डाल रहे हो ? उनके साथ क्यों खेल खेल रहे हो?

उसने तपाक से उत्तर दिया- ये खेल तो चलेगा । आप यह बात अभी नहीं समझोगे और ना हमारे पास इतना टाईम है कि आपको समझाएँ, अभी तो खेल देखो,समय आने पर सब पता चल जाएगा। उसने भी हमें टरकाते हुए कहा कि हमें इंपोर्टेंट मीटिंग में जाना है जिसमें हमारे नेताजी की ऊँची से ऊंची प्रतिमा बनाने का फैसला होने वाला है। अब आप यहाँ से चलिए।

उसकी बात सुनकर हमने फिर अपना रास्ता पकड़ा। वहाँ ठहर कर हम करते भी क्या भला ! हम रास्ते भर यही सोचते रहे कि ये लोग नेता-नेता का खेल खेलकर नेताओं को नहीं बल्कि शायद देश को बांटने का खेल खेल रहे हैं। महापुरुष तो दिलों में बसते हैं। उनकी जीवनियों से हमें प्रेरणा मिलती है और ये हैं कि बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ खड़ी करने पर करोड़ों रुपये फूंकने पर तुले हैं,एक-दूसरे नेता का कद बढ़ाने-घटाने का खेल खेल रहे हैं। योजनाओं से महापुरुषों के नाम और पुस्तकों से महापुरुषों की जीवनियाँ हटा रहे हैं या उन्हें तौड़-मरोड़ रहे हैं। आखिर इनका यह फंडा हमें कहाँ पहुंचाएगा। यह भी हो सकता है आगे चलकर पार्टियां हुकुम जारी कर दें कि जो वे बताएं वही महापुरुष और बाकी को डुबा डालो समन्दर में। हमारा देश महान है और यहाँ कुछ भी हो सकता है । हम सब आजाद जो हैं। -फारूक आफरीदी


 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें