रविवार, 30 नवंबर 2014

निर्बल को ना बल देहि

निर्बल को ना बल देहि

उधार दोस्ती की कैंची है यह कहावत झूठ-मूठ नहीं है और ना ही यह कुकुरमुत्ते की तरह एक रात में नहीं बनी होगी । हमारे बूढ़े-बुजुर्गों ने खूब ठोक-बजाकर परखा होगा तब यह कहावत अस्तित्व में आयी होगी। उधार देने और लेने वाले के बीच एक संवेदनशील और सुकोमल रिश्ता होता है। उधार देने वाला हमेशा से संवेदनशील रहा है। यह अलग बात है कि उसने इस हाथ उधार दिया और दूसरे हाथ वरदान के रूप वेदना ली। उधार वेदना की जननी है। अगर आप उधार दे रहे हैं तो आ बैल मुझे मार वाली हालत को ही दावत दे रहे हैं।
उधार लेते समय इंसान गऊ की तरह निरा भोला,बिना माँ-बाप की तरह अनाथ,मुंह से कोई शब्द ना निकालने वाला एकदम बेजुबान होता है। इसे यूं भी समझ सकते हैं कि एक तरह से वह दुनिया का सबसे गरीब,कमजोर,बेसहारा और सज्जन पुरुष होता है और उस जैसा शरीफ इंसान आपको चिराग से ढूँढे नहीं मिलेगा।
उधार देने वाले सज्जन को ऐसे कठिन समय में यह भान होने लगता है कि ईश्वर ने उसे केवल और केवल इस भलमानुष की सेवा के लिए ही माँ की कोख से अवतरित किया है। अगर वह नहीं जन्मता तो उधार मांगने वाले के साथ संसार का सबसे बड़ा अनर्थ हो जाता और इस अनर्थ को टालने का दायित्व उसी पर है। 
उधार पाते ही उधर निर्बल को बल मिल जाता है और बलवानी के नशे में वह उधारी चुकाने का नाम ही नहीं लेता। आप उधारी चुकाने का तकादा करके देखिये, वह आपको आँख,जुबान और हाथ के रंग दिखाने लगता है। उधार की कैंची आपके पेट में घुसेड़ देने के साथ आपकी माँ-बहन भी करले तो किंचित आश्चर्य की बात नहीं। अपना तो जिंदगी का उसूल है कि उधार में किसी को सलाह भी नहीं देना। माल और इज्जत दोनों से हाथ धोने से बेहतर है दान दे देना लेकिन गलती से भी किसी को उधार ना देना।अपन तो इतना जानते हैं कि काठ की हांडी को चढ़ाकर ही क्यों माँ की कोख से जन्मा देखना। फिर भी किसी को उधारी देने का शौक चर्रा रहा हो तो पहले बाहुबली बनो जो देना जानता है तो लेना भी जानता है। 
–फारूक आफरीदी



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