रविवार, 30 नवंबर 2014

नेताजी का ‘विनम्र आदेश’

नेताजी का विनम्र आदेश

अपने इलाके की नि:स्वार्थ सेवा करने की भावना से से अभिभूत,घरवाली के राज-समाज में प्रभुत्व बढ़ाने के सपने और यारों की हमारे जरिये माल बनाने की उत्कट इच्छा ने हमें निकाय चुनाव लड़ने को मजबूर कर दिया। जीत सुनिश्चित करने के लिए पार्टी का सहारा जरूरी होता है । इसलिए हमने पार्टी से अपनी उम्मीदवारी का फार्म भर दिया। इसके लिए जो भी तिकड़म लगाने थे, लगाए। सारे प्रयासों के बावजूद पार्टी ने लिस्ट से हमारे नाम का पत्ता काट दिया। हमारे एमएलए साहब सारे घोड़े खोलकर अपने रिश्तेदार को टिकट दिला दिया। हम भी फाइनल तक लड़े-भिड़े लेकिन रणखेत रहे। अपने क्षेत्र की सेवा करने की उत्कट इच्छा एक क्षण में काफूर होकर रह गई। वर्षों की हमारी निष्ठा,सेवा और मेहनत को भुलाकर एमएलए साहब ने हमारा बंटाधार कर दिया। हमारे विश्वास का खून हो गया। पार्टी नेताओं ने भरोसा दिलाकर भी हमारी पीठ पर खंजर घोंप दिया गया।
यारों ने झाड पर चढ़ा दिया। बोले- तुसी चिंता ना करो, ईंट से ईंट बजाकर रख देंगे। पार्टी को उसकी औकात बता देंगे कि कार्यकर्ता सिर पर बैठा सकता है तो धूल भी चटा सकता है। हम उनके जाल में ऐसे फंसे कि एन मौक़े पर दूसरी पार्टी में जाने के चांस से भी हाथ धो बैठे । हमने अब बागी-बागी गेम खेलना ही उचित समझा और मैदान में डट गए।
अब अगले ही दिन से हम क्या देखते हैं कि जो समर्थक कल तक एक लंबी फौज की तरह दिख रहे थे, एक-एक गधे के सिर से सींग की तरह गायब होते गए।यह देख हमारा जोश-खरोश रामनाम सत हो गया। चुनाव को हमने मूंछ का सवाल बना लिया था। ऐसे में ‘‘रणछोड़ दास’’ तो कैसे बनते ? राम-राम करके दिन गिनने लगे कि कोई आए और मान-मनुहार करके हमें बैठाये अन्यथा जर और जमीन दोनों से हाथ धो बैठेंगे। धन्य भाग्य हमारे कि ऊपर से नेताजी का आदेश आ गया कि भैया बैठ जाओ, पार्टी तुम्हें कहीं अच्छा पद दे देगी और ना बैठे तो सरकार ऐसे पीछे पड़ेगी कि सारा खाया पीया बाहर आ जाएगा, फैसला तुम्हें करना है।हमारे लब सिल गए। मारता क्या ना करता। हमने जनता से अपील कर दी कि नेताजी का ‘‘विनम्र आदेश’’ शिरोधार्य मानते हुए अपने अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में रिटायर हो रहे हैं। सभी जानते हैं कि सेवा तो विनम्र हो सकती है, लेकिन आदेश हमेशा कठोर ही हुआ करते हैं। फैसला बेशक मजबूरी में लिया गया हो, लेकिन यही कहना पड़ा कि ‘’विनम्र आदेश’’ था। इज्जत बचाने के लिए इससे अच्छा  विकल्प और हो भी क्या सकता था।


-फारूक आफरीदी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें