रविवार, 30 नवंबर 2014

सपने साकार करने का युग

सपने साकार करने का युग

इंसान जब से पैदा हुआ तब से सपने देखता आया है, जैसे सपने देखना उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो। हमें पता नहीं कि इंसान ने अपने तईं सपने देखने का अधिकार कब से छोड़ दिया और कब से दूसरों के सपने साकार करना शुरू कर दिया। हो सकता है लोग राजा-महाराजाओं और बादशाहों के जमाने में भी अपने सपनों की बजाय उनके सपने साकार करते रहे होंगे।  
       आज हम लोकतन्त्र के युग में जी रहे हैं। सपने अभी भी देख रहे हैं। आम आदमी अपने सपने साकार करने के लिए दिन-रात यानी यूं कहें कि जिंदगी भर खटते रहते हैं लेकिन सपने हैं कि साकार होने का नाम ही नहीं लेते। दूसरी ओर हमारे लोकतन्त्र के प्रहरी अपने या आमजन के सपने साकार करने की बजाय अपने नेताजी के सपने साकार करने में लगे हैं।इधर मंत्री पद की शपथ ली और उधर उनका नेताजी के सपने साकार करने का अभियान उछाले मारने लगता है। वे देश-प्रदेश की निष्ठापूर्वक सेवा की शपथ लेकर सीढ़ियाँ उतरते ही उनकी बाट जोह रही मीडिया टीम के सामने अपने और अपनी जनता के सारे सपनों को साकार करने का संकल्प भुलाकर विशुद्ध रूप से अपने महान नेताजी का सपना पूरा करने के लिए कमर कसते दिखाई पड़ते हैं, भले ही उनके नेताजी ने उन्हें बताया भी ना हो कि उनका सपना क्या है। है ना अजीब बात! इस चक्कर में यह भी तो हो सकता है कि उनके नेताजी का सपना कुछ और हो और वे कुछ दूसरा सपना ही साकार कर रहे हों।

यह भी संभव है कि हमारे लोकतन्त्र के प्रहरी अपने नेताजी के सपनों की बजाय अपने और अपने परिवार, रिश्ते-नातेदारों के वे सपने साकार कर रहे हों, जो वर्षों से देख रहे हों। हमारे अनुमान गलत साबित हो सकते और सही भी । असल में उनके सपनों के साकार रूप का पता तो तभी चल पाता है जब वे सपनों की नई पोटली के साथ फिर से लंबे-लंबे हाथ जोड़ते दिखाई पड़ते हैं। -फारूक आफरीदी 

आओ नेता-नेता खेलें

आओ नेता-नेता खेलें 

राजधानी के प्राइम पैलेस में एक पार्टी के बाहर भारी गहमा-गहमी थी। हमने वहाँ बाहर लान में टहल रहे एक नेतानुमा कार्यकर्ता से पूछा- क्यों भाई, आज यहाँ इतनी भीड़-भाड़ क्यों है जबकि छ्ह महीने पहले तो यहाँ कोई चिड़ी का बच्चा भी नजर नहीं आता था। कायकर्ता का जवाब था- हम अपने दिवंगत नेता की शताब्दी समारोह मनाने जा रहे हैं।

यह तो बहुत बढ़िया बात है, हमें ऐसे अवसरों पर महापुरुषों के जीवन आदर्शों से प्रेरणा मिलती है-हमने अपनी राय व्यक्त की।कार्यकर्ता ने उखड़ते हुए कहाकि सारे नेता प्रेरणादायक नहीं होते। हमारे नेता ही प्रेरणादायक हैं, दूसरी पार्टी वाले नेता तो यूं ही तथाकथित नेता हैं।

यह सुनकर हमें थोड़ा गुस्सा आ गया लेकिन उसे पी गए। महापुरुष तो महापुरुष ही होते हैं, इसमें पार्टी का क्या लेना-देना ! वह बोला- नहीं, आप फर्क समझो। हम पटेल, सुभाष,सावरकर,विवेकानंद,दीनदयाल उपाध्याय आदि को मानते हैं। नेहरू-इन्दिरा को हम नहीं मानते। गांधीजी ठीक हैं । उनका सफाई का संदेश घर-घर पहुंचा रहे हैं ना। हमने कहाकि उनका मूल संदेश तो अहिंसा का है, उसका क्या? वह उखड़ते हुए कहने लगा-अभी हटो यहाँ से,बाद में बात करेंगे। यह कहते हुए वह भीतर चला गया । हम अपनी राह पकड़ी।

कुछ आगे बढ़े तो एक और पार्टी के सामने पहले जैसी ही भीड़ देख हमारे पाँव ठिठक गए। हमने वहाँ एक खद्दरधारी से पूछा- यहाँ क्या चल रहा है जी? वह कहने लगा-हम अपने महान नेता की शताब्दी मनाने जा रहे हैं। हमारी पार्टी ने देश को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, नेहरू, सुभाष, अबुल कलाम, शास्त्री, पटेल, इन्दिरा, राजीव, जैसे महान नेता दिये, दूसरी पार्टियों के पास कुछ भी नहीं। हमने कहा- सारे नेता देश के महापुरुष हैं। आप इन्हे क्यों पार्टियों के खांचों-साँचों में में डाल रहे हो ? उनके साथ क्यों खेल खेल रहे हो?

उसने तपाक से उत्तर दिया- ये खेल तो चलेगा । आप यह बात अभी नहीं समझोगे और ना हमारे पास इतना टाईम है कि आपको समझाएँ, अभी तो खेल देखो,समय आने पर सब पता चल जाएगा। उसने भी हमें टरकाते हुए कहा कि हमें इंपोर्टेंट मीटिंग में जाना है जिसमें हमारे नेताजी की ऊँची से ऊंची प्रतिमा बनाने का फैसला होने वाला है। अब आप यहाँ से चलिए।

उसकी बात सुनकर हमने फिर अपना रास्ता पकड़ा। वहाँ ठहर कर हम करते भी क्या भला ! हम रास्ते भर यही सोचते रहे कि ये लोग नेता-नेता का खेल खेलकर नेताओं को नहीं बल्कि शायद देश को बांटने का खेल खेल रहे हैं। महापुरुष तो दिलों में बसते हैं। उनकी जीवनियों से हमें प्रेरणा मिलती है और ये हैं कि बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ खड़ी करने पर करोड़ों रुपये फूंकने पर तुले हैं,एक-दूसरे नेता का कद बढ़ाने-घटाने का खेल खेल रहे हैं। योजनाओं से महापुरुषों के नाम और पुस्तकों से महापुरुषों की जीवनियाँ हटा रहे हैं या उन्हें तौड़-मरोड़ रहे हैं। आखिर इनका यह फंडा हमें कहाँ पहुंचाएगा। यह भी हो सकता है आगे चलकर पार्टियां हुकुम जारी कर दें कि जो वे बताएं वही महापुरुष और बाकी को डुबा डालो समन्दर में। हमारा देश महान है और यहाँ कुछ भी हो सकता है । हम सब आजाद जो हैं। -फारूक आफरीदी


 

साला मैं तो साहब बन गया

साला मैं तो साहब बन गया

रामदीन आज का ताजा अखबार लेकर मेरे पास आया और बोला- बाबू साहब, जरा देखो तो आज गरीब लोगन के लिए कोई खास समाचार छपा है क्या! हमने मोहल्ले वाले थड़ी पर एक बाबूजी से चाय पीते सुना है कि अफसर तो गए बिना भाव के, सरकार ने नए साल से हरेक आदमी को अफसर बनाने का पिलान बनाया है।उसने बताया कि रामदीने, अब तो तू भी अफसर हो गया है रे। उसने पूरी बात नहीं बताई, कुछ मुझे भी दफ्तर आने की जल्दी थी।उसकी बात मेरे समझ में नहीं आई। उसने इतना तो बताया था कि अब नए साल से किसी भी पहचान पत्र या जरूरी दस्तावेज़ सत्यापन के लिए किसी साहब के पास जाने की जरूरत नहीं, बल्कि हम ही उन पर अपने दस्तखत कर तस्दीक कर सकेंगे। क्या यह बात अखबार में छपी है?
अब हम उसकी बात समझे और बोले– हां रामदीन किसी भी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करते समय या राशन कार्ड,जन्म अथवा जाति प्रमाण-पत्र बनवाने या बिजली-पानी कनेक्सन लेने के लिए अथवा किसी कम के लिए अर्जी के साथ जो भी डाक्यूमेंट लगेंगे उन्हें किसी गजेटेड आफिसर से तस्दीक कराने की जरूरत नहीं पड़ेगी, अब तुम खुद ही अपने कागज तस्दीक कर सकते हो।
बाबू साहब,इसका मतलब अब हम खुद ही अफसर बन गये हैं।हमारी मुहर भी चलेगी!यह तो वही हुआ ना कि साला मैं तो साब बन गया।क्या बताएं बाबू साहब, हमने अपने दस्तावेजों के तस्दीक के लिए जीवन में कितने कष्ट उठाए हैं। हमारे अपने साहब भी हर पेपर के दस रुपये के हिसाब से पैसे वसूलते थे और यह अहसान जताते थे कि तुम्हारा इतना बड़ा काम किया जो कोई नहीं कर सकता। हमने कागजों की तस्दीक के लिए घंटों इंतजार किया है साहब। हमारे बच्चों ने ना जाने कितने साबों की दुतकारें झेली और बेगारें की हैं।काले कोट वालों ने भी हमें जमकर लूटा है साहब। कई लोगों ने तो इसे अपना धंधा ही बना लिया। अब उनका क्या होगा साहब!
हमने कहा- अब किसी मुहर की जरूरत नहीं। अलबत्ता, दस्तावेज़ झूठे साबित हो गए तो जुर्माने के साथ जेल भुगतनी पड़ सकती है।रामदीन पलटकर बोला-हमको काहे डराते हो साहब,हमें ठहरे सच्चे-सीधे लोग, सही कागज बनवाने में ही हमारा एड़ी से चोटी तक पसीना छूट जाता है, जूते घिस जाते हैं। ये काम तो बड़े लोगन ही कर सकते हैं जो धनबल और बाहुबल के बूते कानून को जेब में लिए घूमते हैं। उनको अंदर करो ना साहब,जिन्होंने आम लोगन का जीना हराम कर रखा है।
             
-फारूक आफरीदी

निर्बल को ना बल देहि

निर्बल को ना बल देहि

उधार दोस्ती की कैंची है यह कहावत झूठ-मूठ नहीं है और ना ही यह कुकुरमुत्ते की तरह एक रात में नहीं बनी होगी । हमारे बूढ़े-बुजुर्गों ने खूब ठोक-बजाकर परखा होगा तब यह कहावत अस्तित्व में आयी होगी। उधार देने और लेने वाले के बीच एक संवेदनशील और सुकोमल रिश्ता होता है। उधार देने वाला हमेशा से संवेदनशील रहा है। यह अलग बात है कि उसने इस हाथ उधार दिया और दूसरे हाथ वरदान के रूप वेदना ली। उधार वेदना की जननी है। अगर आप उधार दे रहे हैं तो आ बैल मुझे मार वाली हालत को ही दावत दे रहे हैं।
उधार लेते समय इंसान गऊ की तरह निरा भोला,बिना माँ-बाप की तरह अनाथ,मुंह से कोई शब्द ना निकालने वाला एकदम बेजुबान होता है। इसे यूं भी समझ सकते हैं कि एक तरह से वह दुनिया का सबसे गरीब,कमजोर,बेसहारा और सज्जन पुरुष होता है और उस जैसा शरीफ इंसान आपको चिराग से ढूँढे नहीं मिलेगा।
उधार देने वाले सज्जन को ऐसे कठिन समय में यह भान होने लगता है कि ईश्वर ने उसे केवल और केवल इस भलमानुष की सेवा के लिए ही माँ की कोख से अवतरित किया है। अगर वह नहीं जन्मता तो उधार मांगने वाले के साथ संसार का सबसे बड़ा अनर्थ हो जाता और इस अनर्थ को टालने का दायित्व उसी पर है। 
उधार पाते ही उधर निर्बल को बल मिल जाता है और बलवानी के नशे में वह उधारी चुकाने का नाम ही नहीं लेता। आप उधारी चुकाने का तकादा करके देखिये, वह आपको आँख,जुबान और हाथ के रंग दिखाने लगता है। उधार की कैंची आपके पेट में घुसेड़ देने के साथ आपकी माँ-बहन भी करले तो किंचित आश्चर्य की बात नहीं। अपना तो जिंदगी का उसूल है कि उधार में किसी को सलाह भी नहीं देना। माल और इज्जत दोनों से हाथ धोने से बेहतर है दान दे देना लेकिन गलती से भी किसी को उधार ना देना।अपन तो इतना जानते हैं कि काठ की हांडी को चढ़ाकर ही क्यों माँ की कोख से जन्मा देखना। फिर भी किसी को उधारी देने का शौक चर्रा रहा हो तो पहले बाहुबली बनो जो देना जानता है तो लेना भी जानता है। 
–फारूक आफरीदी



नेताजी का ‘विनम्र आदेश’

नेताजी का विनम्र आदेश

अपने इलाके की नि:स्वार्थ सेवा करने की भावना से से अभिभूत,घरवाली के राज-समाज में प्रभुत्व बढ़ाने के सपने और यारों की हमारे जरिये माल बनाने की उत्कट इच्छा ने हमें निकाय चुनाव लड़ने को मजबूर कर दिया। जीत सुनिश्चित करने के लिए पार्टी का सहारा जरूरी होता है । इसलिए हमने पार्टी से अपनी उम्मीदवारी का फार्म भर दिया। इसके लिए जो भी तिकड़म लगाने थे, लगाए। सारे प्रयासों के बावजूद पार्टी ने लिस्ट से हमारे नाम का पत्ता काट दिया। हमारे एमएलए साहब सारे घोड़े खोलकर अपने रिश्तेदार को टिकट दिला दिया। हम भी फाइनल तक लड़े-भिड़े लेकिन रणखेत रहे। अपने क्षेत्र की सेवा करने की उत्कट इच्छा एक क्षण में काफूर होकर रह गई। वर्षों की हमारी निष्ठा,सेवा और मेहनत को भुलाकर एमएलए साहब ने हमारा बंटाधार कर दिया। हमारे विश्वास का खून हो गया। पार्टी नेताओं ने भरोसा दिलाकर भी हमारी पीठ पर खंजर घोंप दिया गया।
यारों ने झाड पर चढ़ा दिया। बोले- तुसी चिंता ना करो, ईंट से ईंट बजाकर रख देंगे। पार्टी को उसकी औकात बता देंगे कि कार्यकर्ता सिर पर बैठा सकता है तो धूल भी चटा सकता है। हम उनके जाल में ऐसे फंसे कि एन मौक़े पर दूसरी पार्टी में जाने के चांस से भी हाथ धो बैठे । हमने अब बागी-बागी गेम खेलना ही उचित समझा और मैदान में डट गए।
अब अगले ही दिन से हम क्या देखते हैं कि जो समर्थक कल तक एक लंबी फौज की तरह दिख रहे थे, एक-एक गधे के सिर से सींग की तरह गायब होते गए।यह देख हमारा जोश-खरोश रामनाम सत हो गया। चुनाव को हमने मूंछ का सवाल बना लिया था। ऐसे में ‘‘रणछोड़ दास’’ तो कैसे बनते ? राम-राम करके दिन गिनने लगे कि कोई आए और मान-मनुहार करके हमें बैठाये अन्यथा जर और जमीन दोनों से हाथ धो बैठेंगे। धन्य भाग्य हमारे कि ऊपर से नेताजी का आदेश आ गया कि भैया बैठ जाओ, पार्टी तुम्हें कहीं अच्छा पद दे देगी और ना बैठे तो सरकार ऐसे पीछे पड़ेगी कि सारा खाया पीया बाहर आ जाएगा, फैसला तुम्हें करना है।हमारे लब सिल गए। मारता क्या ना करता। हमने जनता से अपील कर दी कि नेताजी का ‘‘विनम्र आदेश’’ शिरोधार्य मानते हुए अपने अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में रिटायर हो रहे हैं। सभी जानते हैं कि सेवा तो विनम्र हो सकती है, लेकिन आदेश हमेशा कठोर ही हुआ करते हैं। फैसला बेशक मजबूरी में लिया गया हो, लेकिन यही कहना पड़ा कि ‘’विनम्र आदेश’’ था। इज्जत बचाने के लिए इससे अच्छा  विकल्प और हो भी क्या सकता था।


-फारूक आफरीदी

भाड़ में जाए विकास दर


भाड़ में जाए विकास दर

हमने सरकार को हमेशा देश की गिरती विकास दर की चिंता में डूबे देखा है। पता नहीं इस चिंता में कितनी सच्चाई है, क्योंकि हमने सरकार के पेट में तो घुसकर कभी देखा नहीं। ये सब हाथी के दांत की तरह दिखावा मात्र हो। वैसे यह चिंता करना लोकतन्त्र की जिम्मेदार सरकार होने के नाते अपना फर्ज़ समझती है। यूं सरकार के इतने फर्ज बनते हैं कि अगर उनकी सूची बनानी पड़े तो अलग से एक मंत्रालय और मंत्री बनाकर किसी विस्थापित नेता को स्थापित किया जा सकता है। बहरहाल, वर्तमान मुद्दा है विकास दर को सुधारना और हमें भरोसा है सरकार इसे सुधार कर ही दम लेगी।
विकास दर को लेकर सरकार जो भी सोचे, सोचती रहे, लेकिन हमारे देश के लोग कुछ और ही सोचते हैं।सभी यही सोचते हैं कि देश बनता है व्यक्ति से और व्यक्तियों से, इसलिए सबसे पहले व्यक्ति का विकास होना चाहिए। सरकार अच्छी तरह जानती है कि ऊंचे ऊंचे पदों पर बैठे मंत्री से लेकर अफसर तक और यहां तक कि निचले स्तर पर संतरी तक व्यक्ति अपने-अपने विकास में मुस्तैदी से जुटे हुए हैं। देश का मीडिया अगर जागरूक ना होता तो यह पता ही नहीं चल पाता कि कौन कितना तेजी से अपनी विकास दर को मजबूत बना रहा है।
हमारे मंत्री टू-जी, स्पेक्ट्रम,संचार,खेल,कोयला,रक्षा मामले में कारनामे दिखाकर अपनी विकास दर बढ़ा लेते हैं।हमारे खिलाड़ी मैच फिक्सिंग से अपनी विकास दर को मजबूत बना लेते हैं। ऐसे में हमारे अफसर क्यों पीछे रहें! एक अफसर जिसका मासिक वेतन इतना होता है कि घर-गृहस्थी,बच्चों की पढ़ाई,सफ़ेद कालर की धुलाई का खर्च आसानी से चल जाए किन्तु देखते ही देखते करोड़ों-अरबों में खेलने लगता है।पद चाहे इंजीनियर,वन अधिकारी, पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी आदि कुछ भी हो सकता है। जनता के विकास की ज़िम्मेदारी निभातेनिभाते वे अपने विकास की चिंता में इतने  डूब जाते हैं कि उनकी  विकास दर सौ गुना, हजार गुना,दस हजार गुना बढ़ा जाती है और सरकार की विकास दर का कांटा 5 से 6 प्रतिशत पर आकर अटक जाता है। देश खूब अच्छी तरह जानता है कि हमारे कई महान संतगण भी इस विकास कला में इतना आगे बढ़ गए हैं कि सेंसेक्स की उछाल भी बेचारी शर्म से जमीन में गड़ी जाती है। 
इसलिए हम तो कहते हैं भाड़ में जाए देश की विकास दर । सरकार को तो विकास दर की चिंता बिलकुल छोड़ देनी चाहिए,क्योंकि आज तक जो भी सरकारें रहीं वे भी देश की विकास दर नहीं सुधार सकीं तो इस दु:ख में दुबले होने का क्या मतलब क्या है।व्यक्ति की विकास दर सुधरेगी तो समूहों की भी सुधरेगी और इस तरह एक दिन पूरे देश की विकास दर अपने-आप सुधर जाएगी।हम सुधरेंगे तो देश अपने आप सुधर जाएगा ना।