गुरुवार, 5 मार्च 2015

भारी लिफाफा-हल्का लिफाफा



आज लिफाफे का युग है भले ही एस.एम.एस., एम.एम.एस. और इन्‍टरनेट या मोबाइल पर बड़ी-बड़ी डील' फाइनल होती हों। स्‍मार्ट मनी का युग जोर पकड़ता जा रहा है लेकिन लिफाफा अभी भी अपनी स्‍थिति मजबूत बनाए हुए है।
बात लिफाफे की चली तो इसका संदर्भ बताता चलूं कि मेरे मोहल्‍ले में दो कवि बिल्‍कुल एक दूसरे के पड़ोस में रहते थे। रहते थे क्‍या, यूं समझो कि रहते ही हैं। समझने में क्‍या जाता है? इत्तफाक से हम भी इनके पड़ोसी ही हैं। हम कवि न हुए तो क्‍या काव्‍यरस में तो गहरी रूचि है ही। कभी-कभार इन दोनों के घर बारी-बारी चले जाया करते हैं।
एक कवि का नाम है कुल्‍हड़' तो दूसरे का नाम है फूहड़'। यों दोनों ही एक दूसरे के पड़ोसी होने के नाते दुःख-सुख के साझी भी हैं। कहते भी हैं कि रिश्‍तेदारों से तो पड़ोसी ही भले होते हैं जो रात-बिरात दुःख-सुख में काम आते हैं। इस नाते दोनों ही अपना पड़ोसी धर्म खूब निभाते हैं।यह अलग बात है कि इनकी धर्मपत्‍नियों में जब देखो तब घमासान मचा रहता है।
दरअसल दोनों की धर्मपत्‍नियों में लिफाफा ही झगड़े की जड़ है। जर, जोरू और जमीन तो झगड़े की जड़ होते ही हैं लेकिन लिफाफे को झगड़े की जड़ बना लेना मैंने पहली बार सुना और देखा। मैं इस नये अनुभव से थोड़ा खिन्‍न हुआ तो धन्‍य भी हुआ।
बात यूं हुई कि कवि कुल्‍हड़' की धर्मपत्‍नी रामप्‍यारी जी ने अपनी पड़ोसन और कवि फूहड़' की धर्मपत्‍नी के सुनहरी देवी के सामने शेखी बघारते हुए अपने पतिदेव को सबसे अधिक लोकप्रिय मंचीय कवि बताया। कविफूहड़' की धर्मपत्‍नी को यह बात बिलकुल हजम नहीं हुई और वह उलाहना देने लगी कि तुम्‍हारा पति तो कुल्‍हड़ में रहता है जबकि उसका पति पब्‍लिक का कवि है। रात-रात भर झूम झूमकर कविताएं गाता है। जब वह घर लौटता है तो भी झूमते हुए आता है और नई साड़ियां, दुपट्टे और हरी-हरी चूड़ियों के साथ हरे नोटों का भारी लिफाफा' लेकर आता है। इससे हमारा घर बीहड़ जंगल से बदल कर हरा-भरा हो जाता है।
कविकुल्‍हड़' की धर्मपत्‍नी राधादेवी भला यह सुनकर कहां चुप रह पाती? बोली, ‘मेरा पति तुम्हारे पति की तरह भाण्‍ड नहीं प्रकाण्‍ड पंडित है। उसकी कविताओं में पांडित्‍य है, लालित्‍य है, पौरोहित्‍य है, साहित्‍य है। मेरा पति अकादमी से सम्‍मानित है। सभी आयोजनों में सम्‍मान पाता है। उसका लिफाफा भले ही हल्‍का हो लेकिन सृजन बड़ा वजनदार और शानदार है।
अब कवि फूहड़' की धर्मपत्‍नी को मोर्चा सम्‍भालना ही था सो गोला दागा-  मेरा पति हाई रेट वाला है तो कुल्‍हड़' की धर्मपत्‍नी भी उचक कर बोली, मेरा पति रेसकोर्स वाला नहीं जिस पर चाहे जो दांव लगाये या बाजार में कीमत लगाये।हीरा है हीरा,कोई जलजीरा नहीं जो घोलकर पी जाये।
दोनों की तू-तू मैं-मैं चल ही रही थी कि संयोगवश इसी समय दोनों कविगण एक दूसरे से हाथ मिलाते हुए वहां आ धमके। दोनों की धर्मपत्‍नियां यह मंजर देख कर भौंचक रह गई कि ये तो दोनों तो अपने-अपने हाल में मस्‍त हैं, फिर हम ही क्यों लड़-लड़कर  पस्‍त हो रहीं हैं। मैंने देखा कि वे दोनों चुप-चाप अपने-अपने घरों में घुस गई और परवान पर चढ़ी लड़ाई एकदम फुस्‍स हो गई। मैं यह भी देख रहा था कि कविगण अपने-अपने लिफाफों और लिहाफ में खुश थे।
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(फारूक आफरीदी)

शनिवार, 10 जनवरी 2015

व्यंग्य/वेलकम न्यू ईयर



व्यंग्य/वेलकम न्यू ईयर

अच्छा ही हुआ 2014 जो तुम चले गए।जाना तो तुम्हें था ही क्योंकि जो आता है,उसे एक ना एक दिन जाना ही होता है।यही सृष्टि का नियम है।यहां कोई भी अमरपट्टा लिखाकर नहीं आया।तुम्हें बता दें कि हम तो उगते सूरज को सलाम और जाने वालों को राम-राम करते हैं।तो,तुम्हें राम-राम।हम नए साल यानि 2015 का स्वागत करने में व्यस्त हैं,इसलिए तुम्हें ठीक से विदाई भी नहीं दे पाये।हमें माफ करना,न भी करोगे तो हमारी सेहत पर क्या फर्क पड़ेगा।तुमसे हमारा लेना देना भी क्या।हमें तो अब नए साल से काम है।एक बात आपको बता देते हैं,जिससे तुम्हें थोड़ा संतोष होगा कि जब साल 2016 आयेगा ना,तब हम वर्तमान साल के साथ भी यही सलूक करेंगे जो तुम्हारे साथ कर रहे हैं।कहते हैं न जब जहाज डूबता है तो चूहे सबसे पहले कूदते हैं,तो बस समझ लो कि हम भी एक किस्म के चूहे ही हैं।हम तो ऐसे लोग हैं कि जाने वाले के पीछे मुड़कर भी नहीं देखते,बल्कि धक्का और दे देते हैं,चाहे उसने हम पर कितना ही उपकार क्यों ना किया हो। हमारी फितरत ही कुछ ऐसी है कि भले ही हमें दुनिया में सब जीवों में श्रेष्ठ माना जाता हो,लेकिन हम श्रेष्ठ हैं नहीं। श्रेष्ठता का मायाजाल हमारा ही रचा हुआ है।फिर तुम तो सिर्फ कैलेंडर भर हो,
तुम्हारी तो बिसात ही क्या। वैसे तुमने किया भी क्या हमारे लिए जो हम याद रखें।हम तो जिन्हे याद करना चाहिए उनको भी याद नहीं करते।कितने ही महान नेता हमारे यहां हुए हैं,जिन्होंने कुर्बानियां देकर हमें खुली हवा में सांस लेने की आजादी दिलाई,लेकिन हम उन्हें भी सिर्फ स्वार्थवश ही यानी उनका नाम भुनाने के लिए ही याद करते हैं।हमारी युवा पीढ़ी ने तुम्हें रात बारह बजे तक जागकर याद किया,खूब मस्ती की,नाचे-गाये और ना जाने क्या क्या किया,तुम चाहो तो उसे अपनी विदाई मान लो।तुम्हारा गुणगान करने से साल 2015 नाराज हो जाएगा,इसलिए तुम हमें भूल जाओ,हम भी तुम्हें भूलने जा रहे हैं। हम ऐसे ही हैं,हम कभी नहीं बदलेंगे,बस कैलेंडर बदलते रहेंगे।इसी में हमारी और तुम्हारी भलाई है।नयासाल,हम तुम्हारा हृदय से स्वागत करते हैं।जरा,हमारा ख्याल रखना,इस साल को हमारे लिए गौरवशाली, समृद्धिशाली और खुशहाल बना देना,हमारी सेहत बढ़िया रखना,हमारी सारी मनोकामनाएं पूरी करना,हमारा रोजगार बढ़ा देना,हमारे परिवार में जो-जो भी दुखिया जीव हैं,उन सब पर अपनी सारी खुशियां न्योछावर कर देना।हम और हमारा देश ना पहले कभी सुधरा जो अब सुधरेगा।वेलकम न्यू ईयर। 
-फारूक आफरीदी

रविवार, 7 दिसंबर 2014

बेट्री चार्ज करने का समय



व्यंग्य/ बेट्री चार्ज करने का समय

  
आजकल हर कोई अपनी बेट्री चार्ज करने में लगा है। लोकसभा और राज्य विधान सभा चुनावों में कमल बेट्री ऐसी चार्ज हुई कि सारे ब्रांड ही ठप्प हो गए।समाजवादी बेट्री की समस्या कुछ ज्यादा गहरी है।अब तक एक दूसरे की बेट्री को नाकारा साबित करने में लगी रही क्षेत्रीय कंपनियों ने अब मिलकर एक सूत्री कार्यक्रम बनाया है कि किसी तरह कमल बेट्री को डिस्चार्ज किया जाए। धंधे में ये सब कुछ चलता रहता है। समाजवादी बेट्री के सीईओ मुलायम और लालू अपने भूले बिसरे गीतों की कड़ी को फिर से जोड़ने में जी-जान से जुट गए हैं। वे समझते हैं कि शगुन और सम्बन्धों के नए रिश्ते-नाते बेट्री चार्ज करने में मजबूत आधार साबित होंगे।शायद यह भी मान बैठे हैं कि इससे उनके पालिटिकल मार्केट में अच्छा संदेश जाएगा।

इस समय यूं तो राजनीतिक पटल पर कई बेट्रियां प्रचलित हैं लेकिन एक लंबे समय तक हाथ वाली बेट्री का साम्राज्य रहा जिसे देश की जनता ने नकार दिया और मैनेजमेंट गुरु मोदी ने पहला स्ट्रोक मारकर बाजी अपने पाले में कर ली। इसके साथ क्षेत्रीय स्तर पर पोपुलर कई बेट्री कंपनियों को इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ा है।इसका कारण भी साफ है कि इनका मैनेजमेंट परिवार से ऊपर कभी सोचता ही नहीं था। तृणमूल को छोड़ दें तो लगभग सभी क्षेत्रीय क्षत्रपों की यही दशा रही, चाहे महाराष्ट्र,तेलंगाना, उत्तर प्रदेश,हरियाणा,जम्मू-कश्मीर, झारखंड आदि कोई भी राज्य क्यों ना हो।

राजनीति का धंधा इतना गंदा है कि एक बार जब चौपट हो जाए तो फिर पांच साल तक आसानी से संभलता नहीं और हाथ मलने के अलावा कोई काम नहीं रहता। हां, हाथ वाली कंपनी से लेकर क्षेत्रीय क्षत्रपों की कंपनियों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि नया खिलाड़ी उनके धंधे का ऐसे भट्टा बैठाएगा कि उनको नानी याद आ जाएगी। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है।महाराष्ट्र की एक शरद कंपनी ने तो ऐसी पलटी खाई कि दो भाइयों के फटे में टांग अड़ाकर जिंदगी भर अपनी प्रतिद्वंद्वी रही कमल कंपनी से ही अप्रत्यक्ष हाथ मिला लिया और हाथ कंपनी को धता बता दिया जिसके साथ सुख-दुख में हमेशा दाना-पानी का संबंध रहा। उधर दूसरी तरफ रूठे हुए दोनों भाई जब एक हो गए तो शरद बेट्री की मिट्टी खराब हो गयी।

धंधा कोई भी हो, पापड़ तो सबको बहुत बेलने पड़ते हैं। मुश्किल यह है कि पापड़ बेलने के लिए चार साल का लंबा समय है। डर इस बात का है कि इस बीच  कहीं ये ग्रुप आफ कंपनी बिखर नहीं जाए क्योंकि जिंदा क़ौमें ज्यादा इंतजार नहीं करती। अभी ऐसी कोई बेट्री नहीं बनी जो बिना चले चार साल डिस्चार्ज ना हो।



-फारूक आफरीदी,
बी-70, राज विला’, प्रगति पथ,बजाज नगर, 
जयपुर-302015

  

   


महंगाई पर मजबूत पकड़




महंगाई पर मजबूत पकड़

हमने अपने किराना वाले से कहा-क्यों भई रामरतनजी, आप खाने-पीने की चीजों के दाम क्यों नहीं घटा रहे जबकि सरकार बराबर यह दावा कर रही है कि महंगाई दिनों दिन कम हो रही है।अच्छे दिन आ गए हैं, परंतु हमें तो ऐसा कहीं से भी नहीं लग रहा। वह बोला- आप भी साहब यह कैसी बातें कर रहे हो। महंगाई कहां कम हुई, आप इनके बयानों पर मत जाओ।हमने तर्क दिया कि पेट्रोल और डीजल के दाम तो काफी घट गए हैं इन छ्ह महीनों में, हमने अखबार में पढ़ा है कि कच्चे तेल की कीमतों में 37 प्रतिशत और पेट्रोल डीजल के दाम 8 से 11 प्रतिशत घटे हैं।इनकी वजह से ही आम जरूरतों के दाम घटते-बढ़ते हैं। वह अड़ गया कि आप कुछ समझते नहीं कि दाम घटे तो सरकार ने उत्पाद शुल्क बढ़ाकर सब बराबर कर दिया तो महंगाई वहीं की वहीं रही ना।
रामरतनजी ने आगे खोलकर बताया- देखिये साहब, अगर आप हमारा दिमाग और नहीं चाटने की गारंटी दें तो मैं कुछ कहूं। हमने कहा- चलिये आप बताओ, हम कुछ नहीं बोलेंगे। इस शर्त पर किराने वाले ने बताया-सरकार ने देखा कि तेल के दाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इन छ्ह महीनों में 105 डालर से घटकर 65 डालर प्रति बेरल पर आ गए तो जनता को दिखाने के लिए घटी कीमतों के मुक़ाबले रुपये में चार आने घटा दिये। तेल कंपनियों का फायदा तो यूं का यूं रहा। जनता को मिला बाबाजी का ठुल्लू।
हमने जानना चाहा, हमें तो यह बताओ भाई कि महंगाई कब घटेगी? रामरतन उकता गया। साहब, भारत महान देश है। यहां महंगाई एक बार बढ़ गई तो बढ़ गई । व्यापारी उसे मजबूती से पकड़कर रखते हैं, ताकि पीछे की ओर नहीं लौटे। जैसे-जैसे देश के कदम आगे बढ़ते जाते हैं वैसे ही महंगाई भी बढ़ती है और पीछे नहीं आ सकती।हम रण छोड़ थोड़े ही हैं।इसलिए बाबूजी, यह भूल जाओ कि एकबार दाम बढ़ गए तो कभी कम होंगे। दाम नहीं बढ़ रहे इसी का शुक्र मनाओ। और अच्छे दिन किसे कहते हैं।हमारे लिए तो अच्छे दिन ही हैं। आप तो दो काम करो, अपनी कमाई बढ़ाओ और शॉपिंग बढ़ाओ, अच्छे दिन अपने आप आ जाएंगे। महंगाई को लेकर अगर यूं ही हमसे उलझते रहे तो आपको कभी अच्छे दिन नसीब नहीं होंगे, हमारी बात समझे कि नहीं ? हमने उसके आगे हारकर हां में अपनी मुंडी हिलाई और मंडी की राह पकड़ी।

 -फारूक आफरीदी