आज लिफाफे का युग है भले ही एस.एम.एस.,
एम.एम.एस. और इन्टरनेट या मोबाइल पर बड़ी-बड़ी ‘डील' फाइनल होती हों। स्मार्ट मनी का युग
जोर पकड़ता जा रहा है लेकिन लिफाफा अभी भी अपनी स्थिति मजबूत
बनाए हुए है।
बात लिफाफे की चली तो इसका संदर्भ बताता चलूं कि
मेरे मोहल्ले में दो कवि बिल्कुल एक दूसरे के पड़ोस में रहते थे। रहते थे क्या,
यूं समझो कि रहते ही हैं। समझने में क्या जाता
है? इत्तफाक से हम भी
इनके पड़ोसी ही हैं। हम कवि न हुए तो क्या काव्यरस में तो गहरी रूचि है
ही। कभी-कभार इन दोनों के घर बारी-बारी चले जाया करते हैं।
एक कवि का नाम है ‘कुल्हड़' तो दूसरे का नाम है ‘फूहड़'। यों दोनों ही एक दूसरे के पड़ोसी होने
के नाते दुःख-सुख के साझी भी हैं। कहते भी हैं कि रिश्तेदारों से तो पड़ोसी ही
भले होते हैं जो
रात-बिरात दुःख-सुख में काम आते हैं। इस नाते दोनों ही अपना पड़ोसी धर्म खूब निभाते हैं।यह
अलग बात है कि इनकी धर्मपत्नियों में जब देखो तब घमासान मचा
रहता है।
दरअसल दोनों की धर्मपत्नियों में
लिफाफा ही झगड़े की जड़ है। जर, जोरू
और जमीन तो झगड़े की जड़ होते ही हैं लेकिन लिफाफे को झगड़े की जड़ बना लेना मैंने पहली बार
सुना और देखा। मैं इस नये अनुभव से थोड़ा खिन्न हुआ तो धन्य भी हुआ।
बात यूं हुई कि कवि ‘कुल्हड़' की धर्मपत्नी रामप्यारी जी ने अपनी
पड़ोसन और कवि ‘फूहड़'
की धर्मपत्नी के सुनहरी
देवी के सामने शेखी बघारते
हुए अपने पतिदेव को सबसे अधिक लोकप्रिय मंचीय कवि बताया। कवि ‘फूहड़' की धर्मपत्नी को यह बात बिलकुल हजम
नहीं हुई और वह उलाहना देने लगी कि तुम्हारा पति तो कुल्हड़ में रहता है
जबकि उसका पति पब्लिक का कवि है। रात-रात भर झूम झूमकर कविताएं गाता है।
जब वह घर लौटता है तो भी झूमते हुए आता है और नई साड़ियां, दुपट्टे और हरी-हरी चूड़ियों के साथ हरे
नोटों का ‘भारी लिफाफा' लेकर आता है। इससे हमारा घर बीहड़ जंगल से बदल कर
हरा-भरा हो जाता है।
कवि ‘कुल्हड़' की धर्मपत्नी राधादेवी भला यह सुनकर
कहां चुप रह पाती? बोली,
‘मेरा पति तुम्हारे पति की तरह भाण्ड
नहीं प्रकाण्ड पंडित है। उसकी कविताओं में पांडित्य है, लालित्य है, पौरोहित्य है, साहित्य है। मेरा पति अकादमी से सम्मानित है। सभी
आयोजनों में सम्मान पाता है। उसका लिफाफा भले ही हल्का हो लेकिन सृजन बड़ा वजनदार
और शानदार है।
अब कवि ‘फूहड़' की धर्मपत्नी को मोर्चा सम्भालना ही
था सो गोला दागा- मेरा
पति हाई रेट वाला है तो ‘कुल्हड़'
की धर्मपत्नी भी उचक कर बोली, मेरा पति रेसकोर्स वाला नहीं जिस पर चाहे
जो दांव लगाये या बाजार में कीमत लगाये।हीरा है हीरा,कोई जलजीरा नहीं जो घोलकर
पी जाये।
दोनों की तू-तू मैं-मैं चल ही रही थी कि संयोगवश
इसी समय दोनों कविगण एक दूसरे से हाथ मिलाते हुए वहां आ धमके। दोनों की
धर्मपत्नियां यह मंजर देख कर भौंचक रह गई कि ये तो दोनों तो अपने-अपने हाल में
मस्त हैं, फिर हम ही क्यों लड़-लड़कर पस्त
हो रहीं हैं। मैंने देखा कि वे दोनों चुप-चाप अपने-अपने घरों में घुस गई और परवान पर चढ़ी
लड़ाई एकदम फुस्स हो गई। मैं यह भी देख रहा था कि कविगण अपने-अपने लिफाफों और लिहाफ में
खुश थे।
------.(फारूक आफरीदी)

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